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कला और मनोविज्ञान का सम्बन्ध

Journal: INTERNATIONAL JOURNAL OF RESEARCH -GRANTHAALAYAH (Vol.7, No. 11)

Publication Date:

Authors : ;

Page : 247-251

Keywords : कला; मनोविज्ञान; सम्बन्ध;

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Abstract

कला और कलात्मक व्यापार निष्प्रयोजन और आकस्मिक नही है। उनका जीवन से निकट सम्बन्ध है। जीवन के सुख-दुःख जैसे सुखात्मक और दुखात्मक भावों को कला ही अपने रूप रसायन के द्वारा अस्वादय बना देती है। सुखात्मक भाव तो आनन्द देते ही हैं किन्तु कलाओं की यह विशेषता है कि यहां दुखात्मक भाव -विषाद, भय, शोक जैसे निषेधात्मक भाव भी उदात्त की भावना से प्रेरित हो एक ऐसा रूप पा जाते हैं जिनकी परिणति आनंदमय ही है। भाव-भावना, इच्छा, संकल्प, सृजन आदि भी मन के ही व्यापार हैं। कला के क्षेत्र में तन-मन, पेशी-स्नायु संस्थान, रस ग्रंथि एवं मस्तिष्क और तंत्रिका-तंत्र के सभी भाग व इन सबके साथ अचेतन मन मिलकर और हमारे सारे बोधात्मक अनुभव मिलकर ही किसी रूप का सृजन करने में सहायक हो पाते हैं। फ्रॉयड के द्वारा बताए गए चेतन, अवचेतन, अचेतन मन की तीनों ही अवस्थाएं मन की विशिष्ट ऊर्जा के केंद्र हैं। ये तीनों ही कला-सृजन में ऊर्जा और आलोक देते हैं। इनसे हमारा प्रत्यक्ष, स्मृति, कल्पना, बिम्ब, प्रतीक प्रभावित होते हैं, न सिर्फ प्रभावित होते हैं वरन कला-सृजन इन्हीं के द्वारा निर्देशित होते हुए इस प्रकार स्वतः अभिव्यि होती जाती है कि कलाकार का भी उस पर नियंत्रण नही रहता। ''मानसिक बिम्बों के प्रारम्भिक अवयवों का विश्लेषण करने से ज्ञात होता है कि वे दृष्टि, स्मृतियों, स्पर्श एवं गति से प्रप्त अनुभूति-जन्य सामग्री से रचित हैं।''1 तन्त्रिका तन्त्र, रस ग्रन्थियों में भी मन है जो इनको प्रभावित करता है और इससे प्रभावित होता है।

Last modified: 2020-01-09 15:58:32