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विस्थापन, पुनर्वा स एव ं पर्या वरण

Journal: INTERNATIONAL JOURNAL OF RESEARCH -GRANTHAALAYAH (Vol.3, No. 9)

Publication Date:

Authors : ;

Page : 1-2

Keywords : विस्थापन; पुनर्वा स एव ं पर्या वरण;

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Abstract

मन ुष्य अपनी सुख समृद्धि, भोग एव ं महत्वकांक्षाओं की प ूर्ति हेत ु जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों एव ं पर्या वरणीय तत्वों का अनियोजित एव ं अनियन्त्रित प्रयोग कर रहा ह ै, इस कारण पयावरणीय विघटन एव ं असंत ुलन की स्थिति उत्पन्न हो र्गइ है। जल, वायु, भूमि, वन एव ं खनिज संजीवनी का निरन्तर विघटन हो रहा है, जल स्त्रोत स ूख रहे है, वातावरण विषाक्त हा े रहा है आ ैर भूमि का क्षरण भी हो रहा है। वनो ं के विनाष से पर्यावरण ह्ास में वृद्धि ह ुई है। इन सबके के साथ ही एक अमानवीय सामाजिक समस्या उत्पन्न हुई है और वह ह ै विस्थापन और पुनर्वास की समस्या। प ्रकृति के नजदीक निवास कर रहे लोगों की व्यथा, आदिवासी जनजातिया ें के निवास की समस्या, उनके घरो ं के उजड ़न े और बसन े के बीच की अमानवीय यातना को झेलन े की समस्या अभी तक अनस ुनी है। इनकी व्यथा को व्यक्त करती बाबा आमट े की पँक्तिया ें द ृष्टव्य ह ै:-श् ‘‘यह एक बावली आपदा है सर्वा ेच्च न्यायालय क े फ ैसले से प ैदा भ्रष्ट और प ूँजीवादी त ंत्र ह ै जो न्यास का मात्र प ुरोहिताई का प ुनीत व ेष पहन े नहीं द ेता गार ंटी कि आदमी के हका ें की हिफाजत हो कि बचे रह ें दीन-हीन आदिवासी''

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Last modified: 2017-09-25 19:26:33