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हिंदी-साहित्य म ें प्रकृति

Journal: INTERNATIONAL JOURNAL OF RESEARCH -GRANTHAALAYAH (Vol.3, No. 9)

Publication Date:

Authors : ;

Page : 1-3

Keywords : हिंदी-साहित्य म ें प्रकृति;

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Abstract

हिंदी साहित्यकारों का प्रकृति-प्रेम सर्वविदित है। आदिकाल , मध्यकाल आ ैर आधुनिककाल सभी कालों में प्रकृ ति पर काव्य-रचनाए े ं होती रहीं । प्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकरप्रसादजी लिखत े है ं- ले चल मुझे भुलावा द ेकर मेर े नाविक धीर े-धीर े-जहाँ निर्जन मे ं सागर-लहरी-अंबर के कानो ं में गहरी-निच्छल प्र ेमकथा कहती हो--तज कोलाहल की अवनि कवि न े यहाँ मानव की शांतिप्रियता को इ ंगित किया है ।मानव कोलाहलप्रिय नहीं है, और न ही वह ए ेसी धरती चाहता है।( सागर की लहर) और (अब ंर) के रूप में प्रकृति न े भी मानव से प्र ेम ही किया ह ै ।आज विचारणीय विषय यह है कि फिर ए ेसा क्या है, क्यो ं है, कौन ह ै जो मानव और प्रकृति के अट ूट संब ंधों का े तहस-नहस कर रहा है । व े कौन सी परिस्थितियाँ लगातार बनती रही ह ैं जो धरती विदीर्ण कर रही ह ैं । एक भयावह पर्यावरणीय संकट हम सब पर मँडरा रहा है । अब हमें क्या करना चाहिए । हम सभी जानत े है ं कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति कंगन में नग की भाँति जडी ह ै पर जब बड ़ा स ंकट इस संस्कृति के विनाश का दिखाई द े रहा है तो ए ेंसे में व ैदिककाल से सँजा ेए हमार े जीवन-मूल्य, जो हमें प्रकृति से प्र ेम करना सिखात े हैं, समाप्त हो रहे हैं व ेदों की ऋचाओं में हमें अग्नि,सूर्य, चंद्र, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश और मेघों के प्रति कृतग्यता का भाव दिखाई द ेता ह ै । संस्कृत-साहित्य तो प्रकृति के मनोहारी दृश्यों से भरा पड ़ा है ।वहाँ प्रकृति मानव की सहचरी,सखी और उसका सर्वस्व है ।

Last modified: 2017-09-27 18:46:16