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खेती के नये आयामः समझा ैता क ृषि

Journal: INTERNATIONAL JOURNAL OF RESEARCH -GRANTHAALAYAH (Vol.3, No. 9)

Publication Date:

Authors : ;

Page : 1-4

Keywords : खेती के नये आयामः समझा ैता क ृषि;

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Abstract

बढ ़ती जनसंख्या, बदलती जीवन शैली, कृषिगत उत्पादों का व्यवासायीकरण क े साथ साथ मौसमी परिवर्तनशीलता, उत्पादन प्रवृत्ति मे बदलाव और कृषिगत विषमता के परिणाम स्वरूप सबस े प्रमुख म ुददा कृषि के सुधार और विकास का ह ै। मानव अपन े विकास की चाहे जो सीमा निर्धारित कर ले पर ंत ु उसकी उदरप ूर्ति जमीन से उगे आनाज या उसके प्रसंस्करण स े ही होगी। कृषि के संदर्भ मे तमाम प्रकार के बदलावों क े परिणाम स्वरूप कृषि प ्रणाली मे भी बदलाव द ेखे जा सकत े हैं। साथ ही विश्व की जनसंख्या त ेजी के साथ बढ ़ रही ह ै तथा भारत के संदर्भ मे यह तथ्य है कि यह विश्व की द ूसरी सर्वाधिक जन ंख्या वाला द ेश है जा े 2030 तक यह चीन का े पीछे छोड ़त े ह ुए विश्व की सर्वाधिक आबादी वाला द ेश हो जाएगा। साथ ही भारत की आबादी मे प ्रतिवर्ष 2 करोड ़ लोग बढ ़ जात े ह ै जिनकी आवश्यकता ह ेत ु रोटी, कपड ़ा, मकान की माॅग म े भी व ृद्धि होती जाती है। कृषि उत्पादन क े संदर्भ मे 1960 के दशक मे हरित क्रान्ति आई और कृषि उत्पादन मे लगातार वृद्धि ह ुई पर ंत ु वर्त मान (हरित क्रान्ति क े 55 वर्ष के पश्चात) म े इसक े र्कइ नकारात्मक प्रभाव जिसमे प्रद ूषण, उत्पादकता म े कमी, बीजों की प ्रतिरोधक क्षमता मे कमी, क ृषिगत असमानता, उत्पादन आधारित असमानता इत्यादि। मा ॅग और जरूरतों के हिसाब से कृषि के पर ंम्परागत स्वरूप मे बदलाव भी किया जाना चाहिए जिसस े कृषि उत्पादन तो बढ ़े साथ ही किसानो को भी ज्यादा लाभ हो सके और कृषि कार्य बोझ न रह े। इन उपरोक्त मुददा ें का े निबटाने के लिए सबसे ब ेहतर उपाय साझौता आधारित कृषि है।

Last modified: 2017-09-27 18:47:54